नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने न्यायिक व्यवस्था को आम नागरिकों के लिए और अधिक संवेदनशील व सुलभ बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। इस निर्णय के तहत अब लीगल इमरजेंसी की स्थिति में कोई भी व्यक्ति किसी भी समय अदालतों का दरवाजा खटखटा सकता है। खास तौर पर गिरफ्तारी की तात्कालिक धमकी, मौलिक अधिकारों के उल्लंघन या गंभीर आपात स्थितियों में आधी रात को भी न्यायिक सुनवाई संभव होगी।

मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और समय की बाधा इसमें आड़े नहीं आनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता या जीवन पर तात्कालिक खतरा है, तो न्यायपालिका का कर्तव्य है कि वह तुरंत हस्तक्षेप करे, चाहे वह दिन हो या रात।
यह फैसला विशेष रूप से उन मामलों में राहतकारी माना जा रहा है, जहां देर रात या अवकाश के दौरान गिरफ्तारी की आशंका रहती है और व्यक्ति को तत्काल कानूनी संरक्षण की आवश्यकता होती है। अब ऐसे मामलों में अर्जेंट मेंशनिंग के आधार पर न्यायाधीश सुनवाई कर सकेंगे।
इसके साथ ही CJI सूर्यकांत ने देशभर में लंबित मामलों को लेकर भी अहम संकेत दिए हैं। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित संवैधानिक महत्व की याचिकाओं के शीघ्र निपटारे के लिए अधिक संवैधानिक पीठों के गठन पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। इससे न केवल मामलों के निपटारे में तेजी आएगी, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और विश्वास भी बढ़ेगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारतीय न्याय व्यवस्था में एक बड़ा सुधार है। इससे आम नागरिकों का भरोसा मजबूत होगा और “न्याय में देरी, न्याय से वंचित” जैसी धारणा को भी चुनौती मिलेगी।
कुल मिलाकर, CJI सूर्यकांत का यह फैसला न्यायपालिका को और अधिक जनोन्मुखी, संवेदनशील और सक्रिय बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है, जो आने वाले समय में न्यायिक इतिहास में मील का पत्थर साबित हो सकता है।