रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने कल्याण विभाग द्वारा संचालित आवासीय विद्यालयों में कार्यरत घंटी आधारित शिक्षकों के पक्ष में अहम फैसला सुनाया है। मंगलवार 13 जनवरी को अदालत ने कल्याण विभाग को निर्देश दिया कि वह समान काम के बदले समान वेतन के मुद्दे पर 12 सप्ताह के भीतर निर्णय ले। यह आदेश झारखंड हाई कोर्ट की महाधिवक्ता आनंद सेन की पीठ ने पारित किया।

यह फैसला आवासीय विद्यालय में कार्यरत घंटी आधारित शिक्षक सिलास मुर्मू द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद आया। अदालत ने कल्याण विभाग के सचिव को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि यदि दिवाकालीन पहाड़िया विद्यालय और आवासीय विद्यालयों में कार्यरत घंटी आधारित शिक्षकों के कार्य समान प्रकृति के हैं, तो उनके मानदेय में बढ़ोतरी पर तय समय-सीमा के भीतर गंभीरता से विचार किया जाए।
वेतन असमानता का मामला
याचिका में बताया गया था कि कल्याण विभाग राज्य में दो प्रकार के विद्यालय संचालित करता है—आवासीय विद्यालय और दिवाकालीन पहाड़िया विद्यालय। दोनों संस्थानों में शिक्षक समान जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं, लेकिन आवासीय विद्यालयों के घंटी आधारित शिक्षकों को दिवाकालीन पहाड़िया विद्यालयों के शिक्षकों की तुलना में कम मानदेय दिया जाता है। इसी असमानता को लेकर लंबे समय से समान वेतन की मांग की जा रही थी।
शिक्षकों में खुशी
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद घंटी आधारित शिक्षकों में खुशी का माहौल है। इस मामले को आगे बढ़ाने में रीना कुमारी गुप्ता, अमित कुमार श्रीवास्तव, विनोद, फुलचंद, प्रधान, संगीता, भौगला, अमित कुमार, हीरालाल, मिल्खा, कविता समेत कई शिक्षकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। शिक्षकों की ओर से झारखंड हाई कोर्ट में अधिवक्ता अजीत कुमार ने पक्ष रखा।
बड़ी राहत की उम्मीद
यह निर्णय राज्य के घंटी आधारित शिक्षकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। यदि कल्याण विभाग अदालत के निर्देशानुसार सकारात्मक निर्णय लेता है, तो वर्षों से चली आ रही वेतन असमानता दूर होने की उम्मीद है। साथ ही, इससे शिक्षा व्यवस्था में कार्यरत संविदा शिक्षकों के अधिकारों को भी मजबूती मिलेगी।