रांची पहुंची पुंगनूर नस्ल की गाय, 1 हज़ार रुपये लीटर में मिलता है इसका दूध, देखने वालों की जुट रही भीड़

रांची: राजधानी रांची में इन दिनों लाडो और गुड्डू की खूब चर्चा हो रही है. जो भी इनसे मिल रहा है, वह इन्हें देख कर मोहित हो जा रहा है. लाडो और गुड्डू बहुत छोटे से हैं, लेकिन लोगों के दिलों में इनके लिए प्यार बड़ा दिख रहा है. ये दोनों सभी की आंखो का तारा बने हुए हैं. इनसे मिलने वालों की संख्या रोज बढ़ती जा रही है. ये दिखने में जितने सुंदर हैं, उतने ही गुणवान भी हैं.

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दरअसल, रांची के कांके इलाके में इन दिनों आंध्र प्रदेश के बॉर्डर इलाके से लाई गई दुर्लभ ‘पुंगनूर’ नस्ल की गाय सभी की चहेती बनी हुई है, यह कोई आम गाय नहीं है, यह बहुत ही नन्हीं सी गाय है, जिसकी ऊंचाई महज 24 इंच है. पशु प्रेमी सैयद शौकावत अली इसे आंध्र प्रदेश ले लाए हैं. उन्होंने अपने तबेले में इस गाय को रखा है, जहां इसे ‘लाडो’ के नाम से जाना जाता है. वहीं इसके साथी को ‘गुड्डू’ के नाम से जाना जाता है.

एक घोड़े के बच्चे के बदले लाया गाय

शौकावत अली पशु प्रेमी के रूप में पूरे रांची में मशहूर हैं. उसके पास पहले से ही 20 से ज्यादा घोड़े और अन्य जानवर हैं. इसी बीच उन्हें पुंगनूर नस्ल की गायों के बारे में पता चला. उन्हें ये गायें बहुत पसंद आई. जिसके बाद वे इन गायों को लाने की कोशिश में जुट गए. वे घोड़े के एक बच्चे के बदले इस खास नस्ल की गाय को अपने साथ ले आए. ये गाय इतनी नन्हीं सी है कि शौकावत को इस गाय को लाने में कोई परेशानी नहीं हुई. अपने 5 सीटर निजी वाहन में अपने साथ बैठाकर वे इसे अपने साथ रांची ले आए. शौकावत का कहना है कि इस गाय को पालना जितना आसान है, इसका दूध उतना ही खास और कीमती है. यह गाय महज 1 लीटर दूध देती है. लेकिन इसका दूध औषधीय गुणों से भरपूर होता है, जिसकी कीमत बाजार में 1,000 से लेकर 2,000 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच जाती है.

कम खुराक में संतुलित पोषण

इतना ही नहीं, शौकावत बताते हैं कि पुंगनूर नस्ल की खासियत इसका छोटा कद और कम खुराक में संतुलित पोषण है. मात्र 100 रुपये रोज के खर्च में यह गाय पाली जा सकती है. खास बात यह भी है कि इनकी एक गाय गर्भवती है और वे इसकी ब्रीडिंग के जरिए इस नस्ल को झारखंड में आगे बढ़ाने की योजना बना रहे हैं.

गाय की पीठ पर मौजूद ‘शंख भौरी’

गाय की पीठ पर मौजूद ‘शंख भौरी’ जैसा निशान को भी शुभ माना जाता है. शौकावत का दावा है कि जब से यह गाय तबेले में आई है, उनके सारे काम सफल हो रहे हैं. वे इसे सिर्फ पशुपालन नहीं, बल्कि सौभाग्य का प्रतीक मानते हैं.

बेजुबानों की सेवा में धर्म का कोई भेद नहीं

शौकावत का मानना है कि पशुओं की सेवा में धर्म का भेद नहीं होना चाहिए. वे राजस्थान की परंपरा की ओर इशारा करते हैं, जहां पशुओं के लिए हर घर के बाहर एक बाल्टी पानी रखी जाती है. वे झारखंड के लोगों से भी इस परंपरा को अपनाने की अपील करते हैं, ताकि गर्मियों में बेजुबान जानवरों को राहत मिल सके.

पुंगनूर- दुनिया की सबसे छोटी और अनोखी गाय

पुंगनूर गाय को दुनिया की सबसे छोटी गाय माना जाता है. यह जितनी छोटी है, उतनी ही प्यारी और खास भी है. खूबसूरत दिखने वाली और शांत स्वभाव वाली यह गाय अब काफी लोकप्रिय हो चुकी है. खास बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई थी, जिसमें वह पुंगनूर गायों को चारा खिला रहे थे.

 

पुंगनूर गायों का यह नाम आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के एक कस्बे पुंगनूर के नाम पर रखा गया है. इस नस्ल की उत्पत्ति यहीं से हुई है. कई साल पहले यहां के राजाओं ने इस खास नस्ल को विकसित किया था. आज भी यह नस्ल ज्यादातर इसी इलाके में पाई जाती है.

 

छोटे आकार की यह गाय अब रांची में एक बड़ी पहचान बन चुकी है – यह पशु प्रेम, परंपरा और प्रकृति के बीच एक खूबसूरत सेतु की तरह है.